मेरी बिटिया

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छोटी सी बिटिया मेरी,
जाने कब बड़ी हो गई,
नन्ही सी परी मेरी,
जाने कब सयानी हो गई।

हाथों में लिए घुमाती थी जिसे,
हल्के फुल्के अपने इशारों से हंसाती थी जिसे,
उंगली पकड़ के चलना सिखाया जिसे,
अक्षर अक्षर जोड़कर पढ़ना सिखाया जिसे,
सिरहाने रखकर कहानियां सुनाती जिसे,
गोदी में लिटाकर लोरी सुनाती जिसे,
छोटी सी बिटिया मेरी
जाने कब बड़ी हो गई,
नन्ही सी परी मेरी,
जाने कब सयानी हो गई।

गिरते पड़ते पैरों पर खड़ा होना सीखा जिसने,
आज अपने पैरों पर खड़ी हो गई,
हंसते हंसाते, गिरते संभलते,
मुझसे भी ऊंची हो गई ,
छोटी सी बिटिया मेरी
जाने कब बड़ी हो गई,
नन्ही सी परी मेरी,
जाने कब सयानी हो गई।

अपने तोतले बोल और गानों से, दिल बहलाया जिसने,
अपने नन्हे हाथों से मेरे बालों को सहलाया जिसने,
दुपट्टा को साड़ी की तरह लहराया जिसने,
देखते ही देखते, गुड़िया मेरी जवां हो गई,
छोटी सी बिटिया मेरी
जाने कब बड़ी हो गई,
नन्ही सी परी मेरी,
जाने कब सयानी हो गई।

-Deepika
Copyright: Deepika’s Ramblings
All Rights Reserved

14 thoughts on “मेरी बिटिया

  1. Only a mother’s, none else but a mother’s heart can weave the threads of memory so tender and loving.They are moments of happiness,……..pure and unalloyed watching the bud blossom.
    Deepika has excelled in stringing the words in a language to suit the theme ,so simply and homely.
    Wah Bhai Wah!!!!

    Liked by 1 person

    1. I know… Daughters grow up so fast..I feel like rewinding their childhood and reliving it again. But, now I can see and feel how my mom must be feeling..
      The beautiful journey continues…❤️
      Thanks Pallavi 💕😇

      Like

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